Thursday, April 16, 2009

मन्दिर-१० [तब और अब के मन्दिर]

** मन्दिर वह जहाँ---------
१- मन सिकुड़ता है और चेतना फैलती है
२- वह आँख मिलती है जिससे परमात्मा दिखता है
३- परमात्मा की आवाज गूंजती रहती है
जानें या अनजानें में होश मय साधक जब पहुंचता है तब उसका तन, मन और बुद्धि निर्विकार हो उठते हैं।
** परम प्रीति में डूबा प्रेमी मन्दिर से खिचता चला जाता है उसको कोई रोक नहीं सकता ।
*** कल के मन्दिर और आज के मन्दिर
१- कल के मन्दिर प्रयोग शालाएं थे जहाँ से गणित, ज्योतिष, ज्ञान, विज्ञान की उत्पत्ति हुई और आज के मन्दिर
राजनीति के केन्द्र बन गए हैं।
२- पहले के मन्दिर साधकों द्वारा बनाए गए हैं और आज के मन्दिर अंहकार की उपज हैं जिनको पूजीपति
बनवाते हैं ।
३- आज हम निर्विकार ऊर्जा से परिपूर्ण प्राचीनतम मंदिरों की ऊर्जा पर विकारों की ऊर्जा की चादर चढ़ा दी है।
४- बंगाल के व्याकरनी भत्तोजी एक बार मन्दिर गए और वहाँ से परम धाम चले गए।
५- कल के मन्दिर गाते थे और आज के मंदिरों में बेमन लोग गाते हैं ।
६- कल के मन्दिर हमारे अन्तः कर्ण की सफाई करते थे और आज के मंदिरों की सफाई की जाती है ।
७- कल के मन्दिर वैरागी बनाते थे और आज के मन्दिर भोग-साधनों की प्राप्ति के माध्यम हैं ।
८- कल के मन्दिर एवं मन्दिर जाने वाले दोनों जीवित होते थे और आज दोनों मुर्दे हैं ।
९- कल के मन्दिर और मूर्तियाँ हमें वह सुन्दरता देती थी जिनसे लोग आकर्षित होते थे और आज मंदिरों
तथा मूर्तियों को सजाया-सवारा जाता है ।
१०- कल के मन्दिर हमें पुकारते थे और आज के मन्दिर ...........किसको पुकारते हैं और कौन सुनता है ।
मन्दिर निराकार परम ऊर्जा के श्रोत थे लेकिन दुःख के साथ कहना पड़ रहा है की आज इनको बरात-घर की तरह प्रयोग किया जा रहा है .......सोचिये हम क्या कर रहे हैं ?
=======ॐ======

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