Tuesday, April 28, 2009

दिब्य चक्षु क्या है ? --१

आत्मा-परमात्मा की खोज - कर्म नही , कर्म का फल है
आत्मा- परमात्मा की आहत ह्रदय में सुनाई पड़ती है जब उसमें परम प्रीति की लहर उठती है
परम प्रीति की लहर तब उठती है जब --------
इन्द्रीओं से बुद्धि तक बहनें वाली उर्जा निर्विकार हो जाती है और ----
ऐसा तब होता है जब -------
ऐश्वर्य दृष्टि मिलती है - आप देखिये गीता के निम्न श्लोकों को ----
सूत्र -11.1-११ .4
सूत्र - 11.8
सूत्र - 18.75

अर्जुन परम श्री कृष्ण से अपना १०वा प्रश्न सूत्र ११.१ से ११.४ के माध्यम से इस प्रकार करते हैं -----
हे प्रभु ! आप जो कुछ भी कह रहे हैं ,सत्य है लेकिन यदि मैं आप का अबिनाशी निराकार स्वरूप को देख लेता तो -- --------
परम श्री कृष्ण सूत्र ११.८ के माध्यम से उत्तर देते हैं -------
तूं बात तो ठीक कह रहा है लेकिन अपनें प्राकृत आंखों से तो देख नहीं सकता अतः मैं तुझको ऐश्वर्य दृष्टि देता हूँ ।
परम श्री कृष्ण अपनें निराकार ऐश्वर्य रूपों को दिखाते हैं लेकिन इस से अर्जुन की मनो दशा में कोई परिवर्तन नही आता , यदि अर्जुन- परम श्री कृष्ण को समझे होते तो आगे प्रश्न न करते लेकिन अर्जुन ऐसा सब कुछ देखनें के बाद भी ०६ प्रश्न और करते हैं ।
परमात्मा की जब हवा लगाती है तब वह ब्यक्ति प्रश्न रहित हो जाता है । प्रश्न क्यों उठते हैं ?
प्रश्न संदेह की छाया हैं और संदेह अंहकार की छाया हैं । संदेह मन-बुद्धि तंत्र को ब्याकुल कर देते हैं और यह तंत्र
कम्पन स्थिति में आ जाता है तथा निर्णय लेने में असफल होता है ।
जब अंहकार पर संदेह होनें लगे तब समझना चाहिय की मन-बुद्धि से संदेह भाग रहा है ।
अंहकार पर संदेह का होना ह्रदय में प्रीति की लहर उत्पन्न करता है और प्रीति परमात्मा से मिलाती है।
अर्जुन को मोका मिला , परम उनको दिब्य दृष्टि दी लेकिन अर्जुन चुक गए ,गवा दिया यह मौका पर संजय को
[सूत्र १८.७५ ] दिब्य दृष्टि मिली थी, वेद्ब्यास जी से, जिस को वे नहीं गवाए और कुरुक्षेत्र में धृत- राष्ट्र को उन्हीं
दिब्य नेत्रों से गीता उपदेश सुनाया जो उपदेश परमसे अर्जुन को मिल रहा था ।
दिब्य दृष्टि प्राप्त ब्यक्ति संदेह रहित, प्रश्न रहित , परम प्रीति में डूबा परमात्मा से परमात्मा में अपनें को तथा
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को देखता है ।
गीता के माध्यम से आप भी दिब्य दृष्टि पा सकते हैं बश आप को परम से जुड़ना पडेगा ।
अर्जुन की तरह जब श्री कृष्ण गीता-उपदेश दे हरे थे तब हम-आप भी वहाँ थे लेकिन हमलोग भी चुक गए थे पर गीता में परम स्वयं अपनी आवाज के माध्यम से उपस्थित हैं- क्या आप -------
गीता में परम श्री कृष्ण को खोजेंगे ?
परमात्मा तो पलकों में बसा है लिकिन समझनें की कोशिश कौन करता है ?
गीता का परमात्मा भोग साधनों की प्राप्ति में कोई मदद नहीं करता पर ऐसी होश उठाता है की ------
यह मालूम हो जाता है की भोग बंधन क्या है ?---यही होश परमात्मा से मिलाती है ।
======ॐ======

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