Thursday, April 9, 2009

मन्दिर--३

प्रकृत को धारण करनें वाले नियमों की जो एक झलक दे, वह धर्म है।
धर्म शब्द को ब्यक्त करनें के लिए आज अनेक शब्द हैं लेकिन मन्दिर से वह परम धर्म झांकता है जो इन्द्रियों की
पकड़ से परे का है। गीता कहता है--ब्रह्म की अनुभूति मन-बुद्धि के परे की है और मन्दिर से ऐसी ही अनुभूति हो
सकती है।
मन्दिर दो प्रकार के होते हैं---एक मन्दिर वे मन्दिर हैं जिनको हम सब जगह देखते हैं और दुसरे मन्दिर
वे हैं--जिनको इन मंदिरों से प्राप्त किया जा सकता है। यह बात शायद आप को प्रीतिकर न लगे लेकिन सत्य को
कैसे छिपाया जा सकता है? जो मन्दिर हम जनाते हैं वह कामना पूर्ति के श्रोत हैं और दूसरे मंदिरों से कामना का
उठना समाप्त हो जाता है।
सभी धर्म कहते हैं---परमात्मा सब का एक है लेकिन पता नही क्यों सब की पीठ एक दूसरे की ओरहै।
क्या कारन हो सकता है?----कारन है अंहकार। जुंगकहते हैं ४० वर्ष से ऊपर उम्र के लोगों में शायद ही कोई
ब्यक्ति मिले जिस में परमात्मा की जोच किसी न किसी प्रकार की न हो और जर्मन विचारक नित्झे कहते हैं--
परमात्मा शब्द भयभीत लोगो की उपज है। जीवित प्राणियों में मनुष्य सब का सम्राट है और सब से कम भयभीत
जिव है। यदि भय की उपज परात्मा होता तो आज पृथ्वी पर सभी जानवरों के अपनें अपनें मन्दिर होते और यह
पृथ्वी मंदिरों से भर गयी होती।
मन-मन्दिर का गहरा सम्बन्ध है--मन्दिर वह स्थान है जहा मन शांत होता है। आज हम जिन-जिन मंदिरों में जाते हैं वे मन्दिर अपनें में वह चाभी छिपाए हुए हैं जिस से परम मन्दिर खोला जा सकता है।

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