Friday, December 4, 2009

गीता-ज्ञान ....14

गीता - श्लोक ...4.12 कहता है --------
देव - पूजन से कर्म-फल की चाह पूरी होती है ।
गीता का यह सूत्र अर्जुन के प्रश्न -04 के सन्दर्भ में बोला गया है और यह प्रश्न काम-योग से सम्बंधित है ।
गीता कहता है [ गीता श्लोक - 3.41--3.43 तक ] ------
जब तक मनुष्य का केन्द्र आत्मा नहीं बन जाता तब तक वह आदमी काम के सम्मोहन से पूर्ण रूप से नहीं बच सकता - तो क्या देव पूजन से यह स्थिति सम्भव है ?
कर्म फल की चाह एक कामना है । काम, कामना एवं क्रोध राजस गुण के मूल तत्त्व हैं और राजस गुण भोग का बंधन है । कामना एवं चिंता एक सिक्के के दो पहलू हैं - जहाँ कामना है , चाह भी वहाँ होगी और चाह अहंकार की छाया है [ गीता श्लोक - 3.27 ] फ़िर ऐसे में कौन सा मार्ग उत्तम मार्ग हो सकता है ?
मनुष्य एवं परमात्मा के मध्य भोग प्राप्ति के माध्यमों के रूप में देवताओं का स्थान है [गीता -3.12 ] जो
पूजन से खुश होकर इक्षित भोग की प्राप्ति करवाते हैं । परमात्मा से जुडनें वालों को गीता चार भागों में
ब्यक्त करता है [ गीता- 7.16, 9.25 ], कुछ लोग भोग प्राप्ति के लिए परमात्मा से जुड़ते हैं , कुछ भय निवारण के लिए परमात्मा को याद करते हैं, कुछ में परमात्मा को तत्त्व से जाननें की जिज्ञाशा होती है तो कुछ परम-ज्ञान प्राप्ति के लिए परमात्मा से जुड़ते हैं ---लेकिन इतना समझना काफी होगा की चाह से परमात्मा की शरण नहीं मिलती , फ़िर क्या करना चाहिए ?
राजस-तामस गुणों के तत्वों की पकड़ को समझो जो प्रभु मार्ग में अवरोध हैं लेकिन अहंकार के बश में आकर इनसे दूर न भागो , भागनें वाला जितना भागता है उतना ही और फसता जाता है , यह सब मार्ग हैं , क्या बार बार मार्ग बदल कर कोई अपनें लक्ष्य तक पहुँच सकता है ?
गीता कहता है -------
भोग से भोग में तुम हो , संसार भोग से परिपूर्ण है तुम भाग कर जावोगे भी कहाँ , चाहे हिमालय पर जावो
या कहीं और, जहाँ भी तुम होगे , भोग में होगे अतः अच्छा होगा की अभी जहाँ तुम हो उसे समझनें का
यत्न करो । भोग एक माध्यम है जो एक तरफ़ नरक की ओर ले जाता है तो दूसरी ओर इस का दूसरा छोर प्रभु के आयाम में भी पहुंचाता है , निर्णय आप को करना है की आप को क्या प्रिय है ।
मनुष्य का जीवन एक अवसर है चाहे तो इसे यों ही गुजार दो या फ़िर इसके सहारे परमधाम को प्राप्त करो। एक छोटा सा गीता संदेश अपनें अन्दर बैठा लें ----राजस - तामस गुणों की पकड़ एक स्थूल पकड़ है और सात्विक गुण की पकड़ गहरी सूक्ष्म पकड़ है जिसको तोड़ कर आगे की यात्रा करना इतना आसान नहीं ।
जीवन गति आधारित है , अतः कहीं भी रुक जाना खतरनाक है अतः रुकावट से सावधान रहना , होश का दूसरा नाम है-- जो परमात्मा से जोड़ता है ।
=====ॐ======

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