Saturday, December 26, 2009

गीता-ज्ञान ...35

[क] कौन अपना मित्र है ?
[ख] कौन अपना शत्रु है ?

यह बात गीता श्लोक 6.6 बता रहा है , श्लोक कहता है ------
इन्दियाँ , मन एवं बुद्धि जिसके बश में हैं वह अपना मित्र है और जिस के बश में ये नहीं हैं वह स्वयं का शत्रु है ।
जब आप गीता श्लोक 6.6 को देखें तो गीता के निम्न श्लोकों को भी देख लें तो अच्छा रहेगा .........
2.47- 2.52 , 2.55 , 2.59-2.60 , 2.69-2.70 , 3.19-3.20 , 3.43 , 5.10-5.10 , 6.7 , 18.55-18.56

गीता कहता है -----
इन्द्रियाँ , मन और बुद्धि जिसकी निर्विकार हैं , गुणों से अप्रभावित हैं वह अपना मित्र है और जो ऐसा नहीं है , वह अपना शत्रु है ।

आप सोचिये की आप स्वयं को अपना मित्र मानते हैं की शत्रु , कौन यह कह सकता है की मैं अपना
शत्रु हूँ ? गीता को पढनें वाले कम हैं , पूजक अधिक , ऐसा क्यों है ? क्योंकि गीता सीधे हथौड़ा मारता है
जिस की चोट को बर्दाश्त जो कर पाते हैं वे गीता की साधना में आगे निकल पाते हैं ।
अपना मित्र कौन है ?

[क] जो बिषयों को समझता हो ।
[ख] जो बिषयों की पकड़ को जानता हो ।
[ग] जिसके बश में उसकी इन्द्रियाँ हो और वह अपनें इन्द्रियों का मित्र हो ।
[घ] जो मन के रहस्य को जानता हो ।
[च] जो सन्देह रहित बुद्धि वाला हो ।
[छ ] जो अहंकार रहित हो ।
[ज] जो यह जानता हो की गुण कर्म करता हैं ।
[झ] जो यह जानता हो की सुख-दुःख का अनुभव जब तक है तब तक गुणों का प्रभाव है ।
अर्थात अपना मित्र वह है जो स्थिर बुद्धि वाला है ।

गीता की लम्बाई - चौड़ाई मापनें वाला गीता की गहराई से अनिभिज्ञ रहता है और जो ------
गीता में डूबा रहता है उसको इसकी लम्बाई- चौड़ाई की सोच तक नहीं होती ।
गीता को मापों नहीं , गीता में डुबो।

=====ॐ=====

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