Thursday, December 24, 2009

गीता-ज्ञान ....33

कर्म ज्ञान का सुगम मार्ग है ----गीता श्लोक 18.49- 18.50

गीता के दो श्लोक कहते हैं-----
आसक्ति-स्पृहा रहित कर्म से नैष्कर्म की सिद्धि मिलती है जो ज्ञान-योग की परा निष्ठा है ।

गीता के श्लोक ऐसे हैं जैसे बीसवी शताब्दी के मध्य आइन्स्टाइन का सापेक्ष - सिद्धांत था ---
Theory of relativity के नाम से जो जाना जाता है ।

गीता के सूत्र 18.49 - 18.50 को समझनें के लिए आप यदि गीता के निम्न सूत्रों को भी देखें तो आप को सुबिधा होगी ..........
[क] कर्म रहित होना संभव नही ---गीता ...3.5 , 18.11
[ख] गुणों के प्रभाव में जो कर्म होते हैं वे भोग कर्म हैं ---गीता...2.45 , 3.27 , 3.33
[ग] भोग कर्म के सुख में दुःख का बीज होता है -------गीता....2.14 , 5.22 , 18.38
[घ] कर्म से निष्कर्मता मिलती है --------------------गीता ....3.4
[च] आसक्ति रहित कर्म से निष्कर्मता की सिद्धि मिलती है जो ज्ञान - योग की परा - निष्ठा है --गीता 18.49-18.50

बुद्धि केन्द्रित लोग जो शात्रो का निर्माण करते है वे ज्ञान मार्ग और कर्म मार्ग को अलग- अलग परिभाषित
करते हैं लेकिन गीता कह रहा है ---कर्म ज्ञान का सरल माध्यम है । एक बात आप जान लीजिये - वैसे है
तो तीखी पर है सत्य --शास्त्रों का निर्माण सिद्ध योगी नहीं करता , उसके चारों तरफ रहनें वाले जो तोते की तरह सिद्धि प्राप्त योगी की बातों को अपने दिमाक में बैठा कर रखते हैं , वे योगी के जानें के बाद शास्त्रों का निर्माण करते हैं ।

परा निष्ठा क्या है ?
यह शब्द दो से बना है ; परा और निष्ठा । परा वह अनुभूति है जिसको ब्यक्त नहीं किया जा सकता और
निष्ठा क अर्थ है वह स्थिति जिसके मिलनें के बाद केवल हाँ - हाँ बच रहता है , ना के लिए कोई जगह नहीं होती ।
निर्विकार प्यार, निर्विकार प्रीती , कारन रहित जुड़ना , यह सब निष्ठा हैं । निष्ठा जब उदित होती है तब वह
ब्यक्ति सभी द्वैतों से परे हो जाता है ।

====ॐ=====

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