Wednesday, December 23, 2009

गीता-ज्ञान...31

निष्काम एवं संकल्प रहित कर्म योग-यात्रा को आगे बढ़ाते हैं ---गीता श्लोक 6।3

गणित में 2+1=3 होता है , तीन में एक एवं दो , दोनों हैं लेकिन दिखते नहीं, ठीक इस तरह गीता का भी
समीकरण है ---प्रकृति + पुरुष = मनुष्य , जिसमें न तो प्रकृति दिखती है और न पुरुष ।
गणित समीकरण के तीन में एक एवं दो को देखनें वाला बुद्धिबादी गणितज्ञ कहलाता है और गीता के
समीकरण में मनुष्य में प्रकृति-पुरुष को देखनें वाला तत्त्व-ज्ञानी होता है ।
गीता सूत्र 6.3 कह रहा है ---योग में इच्छा-संकल्प की उर्जा नहीं होती --इस बात को समझना चाहिए ।
योग क्या है ?
किसी भी तरह से परमात्मा में रूचि पैदा करनें का मार्ग , योग है - जिसमें गुणों के तत्वों को समझ कर
ऐसा बन जाना होता है की गुणों के तत्वों का स्वतः त्याग हो जाता है ।
यह यात्रा अंतहीन यात्रा है जिसका प्रारम्भ तो है लेकिन कोई अंत नहीं । योग सिद्धि से बैराग्य मिलता है
जिसमें गुणों के तत्वों का त्याग हो जाता है लेकिन अहंकार एक मात्र तत्त्व ऐसा है जो पुनः योग को
खंडित कर देता है ।

योग खंडित होना क्या है ?
योगी जब अपनें प्रसंशकों से घिरता जाता है तब उस पर राजस-तामस गुणों का प्रभाव एवं अहंकार का असर दिखनें लगता है और इस स्थिति को कहते हैं ---योग खंडित होना ।
बिषय से बैराग्य तक की यात्रा कर्म-योग की यात्रा है जो एक सुलभ यात्रा है लेकिन बैराग्य से आगे की यात्रा ज्ञान की यात्रा है जो परा भक्ति में प्रवेश कराती है । ज्ञान की यात्रा में गुण तत्वों का असर तो नहीं होता लेकिन जैसे- जैसे गुण तत्वों की पकड़ कमजोर होती जाती है , अहंकार और पैना होता जाता है , जो इस बात कोसमझ कर चलते हैं , उनको बुद्धत्व मिलता है और जो नहीं चल पाते , वे योग का ब्यापार करनें लगते हैं ।

गीता गुणों का योग है , जहां -----
न भोग का स्वाद मिलता है
न चाह होती है
न अहंकार होता है
न सुख-दुःख होता है
न मन होता है और
न मंजिल का पता होता है ।

====ॐ=====

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