Wednesday, December 9, 2009

गीता ज्ञान --19

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्र मिह विद्यते ।
तत्स्वयं योगसंसिद्ध : कालेनात्मनि विन्दति ॥ गीता-4.38

क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्व क्षेत्रेषु भारत ।
क्षेत्र क्षेत्रज्ञ योज्ञानं यतज्ञानानाम मतं मम ॥ गीता-13.2
यहाँ गीता सूत्र -4.38 को स्पष्ट करनें के लिए गीता के आठ अध्यायों के उन्तालिश श्लोकों के रस को दिया
जा रहा है और उम्मीद है की यह परम रस आप के अन्दर बहनें वाली उर्जा को रूपांतरित करनें में
आप के संग रहेगा । अब आप उठाइए गीता और देखिये इन श्लोकों को -------------
4.38, 13.2, 13.7-13.11, 2.55-2.72, 14.22-14.27, 2.11, 18.42, 2.46, 6.42, 7.3, 7.19, 12.5, 14.20
गीता श्लोक 4.38 में कहता है ......
ज्ञान वह जो योग-सिद्धी पर स्वत: मिलता है और गीता श्लोक 13.2 में ज्ञान की परिभाषा देता है की ........
ज्ञान वह है जिस से क्षेत्र - क्षेत्रग्यका बोध हो ।
अब आप अपनें ज्ञान की परिभाषा को देखिये और सोचिये की क्या आप की फ्रीक्वेंसी गीता की
फ्रीक्वेंसी से मेल खाती है ?
प्रोफ़ेसर एल्बर्ट आइन्स्टाइन कहते हैं ....ज्ञान दो तरह का होता है ; एक मुर्दा ज्ञान है जो ग्रंथों से मिलता है और दूसरा ज्ञान सजीव ज्ञान है जो बूँद-बूँद चेतन से बुद्धि में टपकता है । चेतना का फैलाव ध्यान से होता है और गीता ध्यान को ज्ञान का श्रोत कह रहा है अतः आइन्स्टाइन की बात वही है जो गीता की है फर्क मात्र भाषा हा है ।
गीता ध्यानी , पंडित , बैरागी , योगी , स्थिर - प्रज्ञा वाले ब्यक्ति , स्थिर मन वाले ब्यक्ति , योगी , सन्यासी और गुनातीत को एक श्रेणी में रखता है और कहता है ------
परमात्मा जिसका केन्द्र है , जिसके पीठ की ओर भोग है , जो ब्रह्माण्ड को ब्रह्म के फैलाव के रूपमें देखता हुआ धन्य - धन्य होता है , जो हर वक्त सम - भाव में रहता है , जो काम कमाना , क्रोध , लोभ, मोह, भय ,आलस्य एवं अहंकार से अछूता है , वह ज्ञानी है तथा वह जानता है की ------
सविकार क्षेत्र , निर्विकार क्षेत्रज्ञ का निवास स्थान है और इस सोच में वह हर पल अपनें तथा लोगों के
क्षेत्र को निर्विका करनें में लगा रहता है ।
इतनी सी बात आप अपनाले की ------
जानें - अनजानें में मनुष्य की खोज उसकी है जो परमात्मामय बनाती है ।
=====ॐ===

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