Sunday, December 20, 2009

गीता ज्ञान - 29

भोग क्या है ? -----गीता श्लोक ....5.22

गीता कह रहा है -------
इन्द्रिय-बिषय के सहयोग से जो होता है , वह भोग होता है जिसके क्षणिक सुख में दुःख का बीज होता है

अब आप इस सूत्र की गहराई को समझें और इस को समझनें के लिए आप यदि गीता की मदत लें तो उत्तम होगा ।
आप गीता के निम्न सूत्रों को इस सूत्र के सम्बन्ध में देख सकते हैं .........
2.45, 3.5, 3.27, 3.33, 2.14, 18.38, 3.4, 18.11, 18.48, 18.49, 18.54-18.55, 6.29, 6.30,
9.29, 5.3, 5.10, 5.11, 5.23, 2.69, 14.19-14.20, 7.3, 12.5, 14.20

अब सोचनें का समय है आप अब सोचना प्रारंभ करें लेकिन पहले गीता सूत्रों की माला को धारण करलें जिनको ऊपर दिया गया है तब उत्तम परिणाम मिलनें की संभावना हो सकती है ।
क्या कोई ऐसा भी कर्म है जो बिना इन्द्रिय एवं बिषय के सहयोग से होता हो ? ऐसा कोई कर्म संभव नही फिर क्या गीता की बात गलत है ? नहीं गीता कैसे गलत हो सकता है ?फिर क्या है ?...आइये देखते हैं ----
गीता कहता है ----गुणों के प्रभाव में जो कर्म होते हैं , वे भोग कर्म हैं जिनके क्षणिक सुख में दुःख का बीज
होता है लेकिन जब कर्म हों और उनके पीछे गुणों का प्रभाव न हो तो ऐसे कर्म , योग कर्म हैं ।
कर्म तो कर्म इन्द्रियाँ ही करेंगी लेकिन गुणों के गुलाम के रूप में नहीं और जब ऐसा होनें लगता है तब वह ब्यक्ति
योग में होता है ।

कर्म तो करना ही पडेगा क्योंकि कोई भी ब्यक्ति या जीव धारी कर्म रहित एक पल भी नहीं हो सकता । कर्म तो एक माध्यम है जो सब को एक सा मिला हुआ है जो एक मार्ग है जिसका एक सिरा भोग में है जहां गुणों का राज्य है और दूसरा सिरा वहाँ जाता है जहां गुनातीत होता है ।
कर्म में कर्म-बंधनों को समझना , गीता-साधना है ।
कर्म के पीछे जब कोई पकड़ न हो तो वह कर्म सिद्धि देता है , सिद्धि में ज्ञान होता है , ज्ञान से क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के प्रति होश बनता है और यही होश गुनातीत बनाता है ।
गुनातीत योगी दुर्लभ योगी होते हैं जो आत्मा से आत्मा में रहते हैं ।

=====ॐ======

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