Tuesday, February 2, 2010

गीता ज्ञान - 65

अपनें को समझो

यहाँ कुछ गीता - समीकरण दिए जा रहे हैं जो आप को अपनें से मिला सकते हैं ------
[क] प्रकृति + पुरुष = मनुष्य
[ख] अपरा + परा + जीवात्मा = मनुष्य
[ग] क्षेत्र + क्षेत्रज्ञ = मनुष्य
अब आप गीता के इन सूत्रों को देखें .....
1- 7.4 - 7.6, 7.12 - 7.14, 13.5 - 13.6, 13.19, 14.3 - 14.4, 14.20, 15.16
2- 13.1 - 13.3
3- 2.18 - 2.30, 10.20, 13.32 - 13.33, 14.5, 15.7 - 15.8, 15.11
अब देखिये गीता के अमृत बचन ----
[क] प्रकृति का ज्ञाता आवागमन से मुक्त हो जाता है --गीता ...13.23
[ख] प्रभु भावातीत एवं गुनातीत है ---गीता ..7.12 - 7.13
अब देखिये इनको ----
[क] अकेलापन अपनें से मिलाता है ।
[ख] संसार की समझ , अपनें से मिलाती है ।
[ग] बनाया गया रिश्ता तो भोग है जो अपनें सुख में दुःख का बीज रहता है ।
[घ] ह्रदय में उपजा रिश्ता , परम रिश्ता है जो सब में एक को देखता है ।
[च निर्विकार मन - बुद्धि उसे देखते हैं जो सब को देखता रहता है ।

परम का रिश्ता बंधन मुक्त रिश्ता है जिसको खोजनें की जरुरत नहीं है यह सर्वत्र है और यह तब मिलता है जब --
हम स्वयं को पहचाननें लगते हैं ।
स्वयं को पहचानो और प्रभु से जुडो ।

====ॐ=====


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