Tuesday, September 7, 2010

गीता अमृत - 22


कर्म योग समीकरण - 03

[क] गीता सूत्र - 2.71
कामना , ममता ,स्पृहा , अहंकार रहित स्थिर बुद्धि, योगी होता है ॥
[ख] गीता सूत्र - 18.2 , 6.10
कामना रहित योगी / सन्यासी होता है ॥
[ग] गीता सूत्र - 18.54
सम भाव में रहनें वाला कामना रहित कर्म योगी परा भक्त होता है ॥

गीता के चार सूत्र कह रहे हैं -----

स्थिर बुद्धि की स्थिति ध्यान का फल होता है ........
गुण तत्त्व या भोग तत्त्व जैसे ------
आसक्ति ,
कामना ,
क्रोध ,
लोभ ,
मोह - ममता ,
अहंकार ,
काम का सम्मोहन ,
भय ......
मनुष्य को भोगी बनाते हैं
और .....
कर्म में जब इनकी पकड़ समाप्त हो जाती है तब वह कर्म करता ......
कर्म - योगी / सन्यासी / स्थिर बुद्धि / समभाव - योगी ......
हो जाता है ॥

===== ॐ ======

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