Wednesday, September 15, 2010

गीता अमृत - 30

कर्म - योग समीकरण - 11

यहाँ हम गीता के दो सूत्रों को देखते हैं -------
[क] गीता सूत्र - 6.2
संन्यास एवं योग , दोनों एक हैं .......
[ ख ] गीता सूत्र - 5.2
कर्म - योग एवं संन्यास , दोनों मुक्ति - पथ हैं लेकीन .......
कर्म - योग , कर्म संन्यास से उत्तम है ॥

यहाँ प्रभु श्री कृष्ण क्या कहना चाहते हैं ?
एक बार कहते हैं , दोनों एक हैं और एक बार कहते हैं .....
कर्म - योग , कर्म संन्यास से उत्तम है ॥
गीता में संन्यास शब्द के दो भाव हैं ; यहाँ संन्यास शब्द का वह भाव है जो हम लोग समझते हैं ,
अर्थात संन्यास एक कृत्य है , जिसमें कर्म का त्याग कर्म - योग का फल नहीं है अपितु
कर्म - त्याग किसी कारण बश हुआ है ।

प्रभु गीता में कहते हैं -----
यदि कर्म - योग का फल कर्म संन्यास है तो दोनों एक हैं अर्थात एक के बिना दूसरा संभव नहीं
हो सकता और यदि कोई बिना योग में उतरे संन्यासी बनता है तो यह उसके लिए बहुत ही
कष्ट प्रद होगा । कर्म - योग साधना में जब कर्म बंधनों का प्रभाव समाप्त हो जाती है तब
बिना चाह , बिना अहंकार एवं बिना किसी कारण जो कर्म होता है , वह उस ब्यक्ति को
संन्यासी बना देता है ।

सन्यासी या योगी की पहचान उसके वेश - भूसा से नही हो सकती , उसके साथ रहनें से जब उसकी
ऊर्जा हमारे अन्दर भरनें लगती है तब पता चलता है की यह ब्यक्ति योगी - सन्यासी है ॥
केशव , एक महान शास्त्री परम हंस जी से बहश करनें के लिए आये , बोलते रहे - बोलते रहे
और जब चुप हो जाते थे तब परम हंस जी उनके पैरों में गिर कर कहते -----
आप चुप क्यों हो गए ? आप जो कुछ भी कह रहे हैं , वह अति उत्तम हैं , कहते रहिये ।
केशव अपनें संस्मरण में लिखते हैं .......
परमात्मा है या नहीं , कुछ कहना उचित नहीं लेकीन इस ब्यक्ति को देखनें से ऐसा लगता है की ----
हो न हो यही परमात्मा हो ॥

==== ॐ ======

No comments:

Post a Comment

Followers