Sunday, September 12, 2010

गीता अमृत - 26

कर्म योग समीकरण - 07


गीता के चार सूत्र ..........
[क] सूत्र - 18.10 , 18.23
संदेह रहित सम भाव में नियमित कर्म जो आसक्ति , राग - द्वेष रहित होते हैं , उनको सात्विक
कर्म कहते हैं ॥
[ख] सूत्र - 18.24
मैं करता हूँ , इस भाव से कामना पूर्ति के लिए किये गए कर्म , राजस कर्म [ भोग कर्म ] होते हैं ॥
[ग] सूत्र - 18.25
ममता , आलस्य के प्रभाव में जो कर्म होते हैं , उनको तामस कर्म कहते हैं ॥
अब पांचवां सूत्र देखिये --------
सूत्र - 3.27
कर्म करता तो गुण हैं और करता मैं हूँ का भाव , अहंकार की उपज है ॥

कर्म मनुष्य के लिए एक सहज माध्यम है जो एक तरफ नरक में पहुंचता है और दूसरी तरफ प्रभु में जा
मिलता है । प्रभु कहीं कोई बस्तु नहीं , कोई सूचना नहीं जो time space में हो और इस से प्रभावित हो ,
यह तो एक अब्यक्त , निराकार , सीमा रहित द्रष्टा / साक्षी रूप में सब का आदि , मध्य एवं
अंत का कारण है ।
तामस एवं राजस गुणों से सात्विक गुण में पहुँचना , मनुष्य के हाँथ में है
लेकीन इस के आगे की यात्रा प्रभु
का प्रसाद रूप में किसी - किसी को मिलती है ।

गुण चाहे कोई भी क्यों न हो , वह बंधन है , बंधन बंधन ही रहेगा और जब तक मनुष्य बंधन मुक्त नहीं होता ,
वह प्रभु मय नहीं हो सकता ।
मनुष्य के पास असीमित बुद्धि है , वह वही कर्म करता है जो अन्य जीव करते हैं , अन्य जीव अपनें - अपनें
कर्मों के सम्बन्ध में अपनी - अपनी बुद्धि केवल एक दिशा में लगा सकते हैं , भोग की
दिशा में , जबकि
मनुष्य इस भोग को योग की दिशा दे सकता है और यदि ऐसा हुआ तो वह साधारण मनुष्य नहीं रह जाता, वह प्रभु तुल्य हो जाता है ।

===== ॐ ======

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