Thursday, September 2, 2010

गीता अमृत - 17


गीता श्लोक - 13.15

प्रभु कहरहे हैं .......

[क] प्रभु इन्द्रियों का मूल श्रोत पर स्वयं इन्द्रिय बिहीन है
[ख] तीन गुणों का जन्म दाता पर स्वयं गुण रहित है
[ग] सब का पालन करता पर अनासक्त भाव में
यह बात प्रभु अर्जुन से कह रहे हैं , अर्जुन सुन यह मेरी स्थिति है ॥

प्रभु गीता श्लोक 10.22 के माध्यम से कहते हैं ......
इन्द्रियाणां मनश्चाष्मी , भूतानाम्श्च चेतना अर्थात -----
इन्द्रियों में मन मैं हूँ और भूतों की चेतना भी , मैं ही हूँ ।
दस इन्द्रियाँ एवं पांच बिषय , मन के फैलाव रूप में हैं , मन उस विन्दु को कहते हैं जहां पांच कर्मेन्द्रियाँ और पांच ज्ञानेन्द्रियाँ मिलती हैं । मन अपनें सुविधा के लिए इन्द्रियों का ताना - बाना फैला रखा है ।

प्रभु सातवे अध्याय में कहते हैं -----
तीन गुण और उनके भाव , मुझसे हैं लेकीन मैं गुनातीत एवं भावातीत हूँ ।
गुण मनुष्य को प्रभु से दूर रखते हैं ।
गुणों का सम्मोहन इतना गहरा होता है की कोई प्रभु की ओर अपनें को चला नहीं सकता ।
गुण प्रभु की राह में
अवरोध हैं ।

प्रभु तीसरी बात कह रहे हैं ----
मैं अनासक्त भाव में सब का पालन - हार हूँ ।
आप कल्पना कीजिये क्योंकि सभी लोग अपनें - अपनें परिवार का पालन - हार समझते हैं लेकीन उनमें से
कितनें ऐसे हो सकते हैं जो बिना आसक्ति के अपनें परिवार के लिए कुछ करते हों ?
आसक्ति का भाव है -- बिना किसी भाव के और जो कर्म का परिणाम मिले ; अच्छा या बुरा उससे संतुष्ट रहना ।

प्रभु की तीन बाते हैं - हम सब के लिए , आज से अभ्यास पर लगना है और ठीक एक माह बाद देखते हैं क्या
परिणाम होता है ?

==== ॐ =====

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