Monday, September 20, 2010

गीता अमृत - 34

कर्म- योग समीकरण - 15
गीता के दो सूत्र ---------
[क] सूत्र - 6.10
सूत्र के माध्यम से प्रभु अर्जुन को कह रहे हैं ........
किसी से आकर्षित न होनें वाला , तन , मन से एकांत बासी , प्रभु केन्द्रित ब्यक्ति , योगी होता है ॥
[ख] सूत्र - 18.2
यहाँ प्रभु कहरहे हैं .......
कामना रहित कर्म से ब्यक्ति संन्यासी बनता है और कर्म में कर्म फल की चाह का न होना कर्म - त्याग
कहलाता है ॥

गीता को लोग एक बिषय बना दिए ; ऐसा बिषय जो सर्प की तरह हो , लोग दूर से भय के कारण इसे पूजें , लेकीन इसको खोल कर पढ़ें नहीं ।
पहले तो संस्कृत भाषा में लिखे धार्मिक ग्रन्थ ब्राहमणों की पूँजी थे ,
इनको कोई हाँथ से छु नहीं सकता था , पढ़ना तो दूर रहा , लेकीन समय बदला और
लोग भी बदल गए और आज ब्राहमणों के अलावा अन्य वर्ण के लोग हिन्दू धार्मिक ग्रंथों को
अधिक पढनें वाले हैं ।
श्री चन्द्र मोहन रजनीश [ ओशो ] , श्री श्री महेश योगी - एनेकों अन्य लोग ब्राहमण नही थे / हैं लेकीन
लोग उनको गुरु की भाँती पूजते हैं ।

वक्त के साथ - साथ बहुत बदलाव आया लेकीन प्राचीन ग्रंथों के अमृत सूत्र बिना किसी धर्म
के नाम से जोड़े , पाठशालाओं में प्रवेश न पा सके , यह दुःख का बिषय जरुर है ।
गीता में लगभग 200 से भी कुछ अधिक ऐसे सूत्र हैं जिनका सीधा सम्बन्ध मनोविज्ञान से है
और जिनमें फ्रायड - जुंग जैसे मनो वैज्ञानिकों से भी उत्तम विचार हैं लेकीन ऐसे सूत्र आम
लोगों से परे हैं क्योंकि गीता हिन्दुओं से सम्बंधित है ।
कुरान शरीफ - बाइबल और अन्य धार्मिक ग्रंथों में अनेक रहस्य दबे
पड़े हैं जिनको आम लोग नहीं पा सकते ।

गीता के छोटे - छोटे सूत्रों को यदि स्कूल के पाठ्य क्रमों में बिना धर्म के साथ जोड़े ,
डाला जाए तो आगे आनें वाली नश्ल के पास वैज्ञानिक एवं मनो वैज्ञानिक अनेक शोध के काबिल
रहस्य हो सकते हैं , जिन से आम लोगों को भविष्य में फ़ायदा हो सकता है ॥

ऊपर के सूत्रों में आपनें देखा की संन्यास और योग का आपस में क्या सम्बन्ध है और दोनों को
त्याग जो
स्वतः हो , कैसे जोड़ता है ॥

===== ॐ =====

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