Monday, April 12, 2010

ग्रन्थ साहिबजी एवं गीता - 29

श्री नानकजी साहिब मायातीत योगी थे

मायातीत को समझनें के लिए गीता में निम्न श्लोकों को देखना चाहिए -------
7.14 - 7.15, 16.8, 13.19, 7.4 - 7.6, 13.5 - 13.6, 14,3 - 14.4,
14.20, 14.22 - 14.27, 7.12 - 7.13, 2.48 - 2.51, 18.40, 2.16

आप जब गीता के ऊपर दिए गए श्लोकों को अपनाएंगे तब आप आदि गुरु नानक के ह्रदय से जुड़ सकते हैं ।
गीता कहता है -- प्रभु एवं मनुष्य के मध्य प्रभु रचित माया का पर्दा है । माया वह ऊर्जा है जिससे ब्रह्माण्ड
एवं ब्रह्माण्ड की सूचनाएं हैं । माया से परे कुछ नहीं है माया के प्रति जब होश आजाता है
तब उस ब्यक्ति
के मन - दर्पण पर जो होता है उसका नाम है प्रभु ।

माया तीन गुण , दो प्रकृतियों एवं आत्मा - परमात्मा से है । माया दो का योग है - एक है , निर्विकात और दूसरा है , सविकार । निर्विकार में चेतना , आत्मा एवं परमात्मा हैं और सविकार तत्वों में हैं , अपरा के आठ तत्त्व ।
माया में भोग का गुरुत्वाकर्षण होता है जो प्रभु की ओर रुख होनें नहीं देता और माया का
बोध , मनुष्य के रुख को प्रभु की ओर कर देता है ।

माया के आकर्षण से अप्रभावित ब्यक्ति हर पल प्रभु में रहता और -----
++ सम - भाव स्वभाव वाला होता है
++ अहंकार रहित होता है
++ सब को आत्मा से आत्मा में देखता है
++ भोग तत्वों के सम्मोहन में नहीं फसता
++ गुनातीत होता है
++ भोग में रहते हुए भी भोग से अप्रभावित रहता है

मायातीत योगी जैसे आदि गुरु नानक , परमहंस राम कृष्ण सदियों बाद अवतरीत होते हैं ।

==== एक ओंकार सत नाम ======

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