Friday, April 30, 2010

जपजी साहिब - 11


सुणिए सरा गुणा के गाह .....
सुणिए सेख पीर पातिसाह .....
सुणिए अंधे पावहि राहु ......
सुणिए हाथ होवे असगाहु ॥

आदि गुरु श्री नानकजी साहिब कहते हैं -----
सुननें वाला ......
ज्ञान सागर में बसता है ...
बादशाह शेख पीर बनता है ...
और सुननें से ---
अंधों को राह मिल जाता है ...
समुद्र भी उथले हो उठते हैं ॥

गुरूजी साहिब अंधा शब्द किसके लिए प्रयोग कर रहे हैं ? और समुद्र उथले हो उठते हैं कहनें के पीछे क्या भाव है ? इन दो बातों को समझना चाहिए ।

दर्शन में अज्ञानियों के लिए अंधा शब्द का प्रयोग किया जाता है और गीता कहता है -----
कामना एवं मोह अज्ञान की जननी हैं [गीता - 7.20, 18.72 - 18.73 ] और
गीता [ गीता - 13.2 ] कहता है --
ज्ञान वह है जो यह बताये की क्षेत्र - क्षेत्रग्य क्या हैं ? समुद्र उथला होनें का अर्थ है - अहंकार का कमजोर होते जाना ।

आदि गुरु श्री नानकजी साहिब जपजी साहिब में कहते हैं -----
प्रभु के गुणगान को सुननें वाला ----
आत्मा - परमात्मा को समझता है ....
क्षेत्र - क्षेत्रग्य को जानता है ....
प्रकृति - पुरुष को पहचानता है ...
आत्मा से आत्मा में आनंदित रहता है ॥

==== एक ओंकार सत नाम ====

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